Baobab Tree: दैत्याकार पेड़, जिसमें घर बनाकर रहते हैं आदिवासी, भारत में ऐसा है इतिहास

अपडेट किया गया: फ़र. 1

Baobab Tree। दुनिया कई रहस्यों और अजीबो-गरीब चीजों से भरी पड़ी हुई है। यदि आप कभी मध्यप्रदेश के ख्यात पर्यटन स्थल मांडू की सैर करने जाएंगे तो आपको सड़क किनारे ठेले पर कई लोग एक बड़ी सी इमली बेचते हुए नजर आएंगे। मांडू की सैर करने वाले पर्यटक अक्सर इस इमली को खरीद कर लाते हैं। एक बड़ा सा फल, जो स्वाद में खट्टा रहता है, इसे लेकर मांडू और आसपास के इलाकों में मान्यता है कि इसे घर में रखने कोई विपत्ति नहीं आती है। ऐसे में मांडू जाने वाले पर्यटक इसे स्वाद के लिए खरीदकर लाते हैं तो कुछ लोग मान्याताओं के चक्कर में भी इस फल को खरीद लेते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इसमें अजीबो-गरीब क्या है। दरअसल इसमें इमली के स्वाद वाला फल अजीब नहीं हैं, जबकि अजीब है वो पेड़, जिस पर यह फल लगता है। इस पेड़ का नाम है बाओबाब, जिसका वैज्ञानिक नाम है Adansonia Digitata

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विशाल राक्षस की भांति दिखता है बाओबाब का पेड़

अगर आप मांडू सैर करेंगे तो बाओबाब का विशाल दैत्याकार पेड़ देखने को मिल जाएगा। मांडू शहर को यहां के सुल्तान होशंगशाह ने बसाया था। मध्य युग में होशंगशाह का शासन था तो मालवा अंचल में मांडू ही राजधानी थी। होशंगाशाह के बाद भी लंबे समय तक मांडू सत्ता का केंद्र रहा है। ऐसा माना जाता है कि बाओबाब के पेड़ को सबसे पहले सुल्तान होशंगशाह द्वारा ही अफ्रीका से यहां बुलवाया गया था।

धीरे-धीरे यह पेड़ मालवा सहित प्रदेश के अन्य इलाकों में भी पैर पसारने लगा और अब ये पेड़ मध्यप्रदेश के अन्य जिलों में भी देखने को मिल जाता है, हालांकि इनकी संख्या बेहद कम है। मोटे-मोटे तनों वाले भयानक पेड़ों का साम्राज्य विशेषकर मांडू में ज्यादा देखने को मिलता है। इस पेड़ में पत्तियां तो बहुत कम समय के लिए लगती है, लेकिन फल ऐसा लगता है, मानो बड़ी सी घूस (बहुत मोटे आकार का चूहा) पेड़ पर उल्टी लटका दी गई हो।


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भारतीय मूल का नहीं है बाओबाब का पेड़

ये पेड़ भारतीय मूल का नहीं है। बाओबाब का पेड़ अफ्रीकी महाद्वीप में ज्यादा पाया जाता है। वहां कई आदिवासी जातियां इसके विशाल तनों को खोखला करके अंदर रहने लायक कमरे बना लेती है। इतिहासकारों का यह मानना है कि सुल्तान होशंगशाह की सेना में कई अफ्रीकी गुलाम भी थे और हो सकता है कि यह पेड़ उनके जरिए ही होशंगशाह की नजर में आया हो और उन्होंने इसे मांडू में पहली बार लगावाया हो। अफ्रीका के सवाना क्षेत्र में यह पेड़ बहुत अधिक तादाद में पाया जाता है। भारत की जलवायु में ये पेड़ पनप जरूर गया लेकिन फिर भी आकार में मामले में वैसी भयावहता और विशालता नहीं ले पाता है, जैसा कि दैत्याकार पेड़ अफ्रीका का सवाना इलाके में पाए जाते हैं। भारत की तुलना में अफ्रीकी बाओबाब के पेड़ काफी बड़े दिखाई देते हैं। अफ्रीकी महाद्वीप पर यह पेड़ आदिवासी जनजातियों के कई दैनिक कार्यों में उपयोगी है। घर बनाने के अलावा पानी की पूर्ति, भोजन, फलों से आय भी उपलब्ध कराता है।

15 मीटर से भी ज्यादा होती है तने की गोलाई

बाओबाब के पेड़ के तने की गोलाई 15 मीटर से भी ज्यादा होती है, साथ ही अंदर से खोखले भी होते हैं। ऐसे में बारिश के मौसम में इन पेड़ों में हजारों लीटर पानी संग्रहित हो जाता है। साथ ही इस पेड़ की खाल कार्क के समान होती है, इसलिए अग्निरोधक होता है। यही कारण है कि अफ्रीका के गर्म इलाकों में इस पेड़ के खोखले तनों में बने कमरों में रहने पर ठंडक मिलती है।

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बाओबाब पेड़ की अन्य खासियत

- तने के रेशों से कपड़े और रस्सी बुनी जाती है, साथ ही इस पेड़ की पत्तियां खाने के काम में भी आती है। इसकी पत्तियों में औषधीय गुण होता है। बाओबाब के पेड़ (Adansonia Digitata) की पत्तियों का प्रयोग खाने का जायका बढ़ाने के लिए भी किया जाता है।

- इसमें जो फल लगता है, उस फल को मंकी ब्रेड (Monkey Bread) कहा जाता है, जो इमली जैसा खट्टा होता है और विटामिन सी का प्रमुख स्रोत है। फल का आवरण सूखी लौकी की तरह कठोर होता है और खट्टे गूदा भरा होता है।

- अगर मांडू की बात करें तो कई लोग इसे खुरासिनी इमली भी कहते हैं। साथ ही साइट्रिक एसिड बनाने में भी इस फल का प्रयोग किया जाता है।

- उत्तरप्रदेश के प्रयागराज और लखनऊ क्षेत्र में भी बाओबाब के पेड़ मौजूद हैं, हालांकि यहां इनका आकार बहुत ही छोटा है। इस इलाके में इसे गोरख इमली के नाम से जाना जाता है।


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