प्रदोष व्रत से होगा कष्टों का निवारण, मिलेगा भगवान शिव से वरदान

प्रदोष व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। प्रदोष व्रत 26 मार्च 2021 को है। हिन्दू पंचांग के अनुसार इस महीने प्रदोष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन के कई कष्ट दूर हो जाते हैं और इससे अपने पापों का प्रायश्चित किया जा सकता है। भगवान शिव की आराधना करने से इस दिन की गई हर मनोकामनाएं पूर्ण होती है। आइए जानते हैं प्रदोष व्रत करने की विधि के बारे में तथा इसकी पौराणिक कथाओं के बारे में-

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प्रदोष व्रत का महत्व

ऐसा कहा जाता है कि प्रदोष व्रत के बारे में सुत जी ने गंगा तट पर सभी ऋषियों को बताया था कि जब कलयुग में अन्याय बढ़ता जाएगा तो उस समय लोग अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए प्रदोष व्रत करेंगे जिससे वे अपने कष्टों से मुक्ति पा सकेंगे और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।


प्रदोष व्रत को इस तरह करें

सुबह जल्दी उठकर इस दिन स्नान कर निराहार रहकर शिवलिंग का जल और दूध से स्नान करें। इसके बाद शिवजी पर बेलपत्र, शमी, धतूरा, फूल, चावल, फल, पान, धूप, दीप और सुपारी आदि अर्पण करें। इस दिन पूरा दिन निराहार रहकर भगवान शिव का मंत्रजाप करें इससे लाभ होगा। इस दिन सिर्फ हरे मूंग का सेवन करना चाहिए। हरा मूंग पृथ्वी तत्व कहलाता है जो मंदाग्नि को शांत बनाए रखता है। इसके अलावा इस दिन सादा नमक, अन्न, चावल और लाल मिर्च का सेवन नहीं करना चाहिए। यदि फलाहार लेना चाहते हैं तो ले सकते हैं।


प्रदोष व्रत की कथाएं

प्रदोष व्रत की ऐसी कई कथाएं जिसे सुनकर हर कोई इस व्रत की महत्ता को समझेगा। ऐसी ही एक कथा है जब चंद्र को क्षय रोग हो गया था। यह रोग मृत्यु के समान कष्टदायी था। त्रयोदशी के दिन भगवान शिव ने इनके दोष का निवारण किया था और इन्हे कष्टमुक्त किया, उसी दिन से इस दिन को प्रदोष कहा जाने लगा। स्कन्द पुराण में भी प्रदोष व्रत के बारे में बताया गया है। ऐसे ही पद्म पुराण में भी प्रदोष व्रत को लेकर एक कथा मिलती है जिसमें चंद्रदेव की 27 पत्नियां थी जिनमें से चंद्रदेव सिर्फ अपनी एक ही पत्नी रोहिणी को प्रेम करते थे तथा अपनी बाकी 26 पत्नियों की वे उपेक्षा किया करते थे जिससे उन्हे श्राप मिला और उन्हें कुष्ठ रोग हो गया। इस श्राप से मुक्त होने के लिए सभी देवताओं की सलाह पर उन्होने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव की आराधना की और आराधना करने वाले स्थान पर ही एक शिवलिंग स्थापित किया। इनकी भक्ति देख भगवान शिव इन पर प्रसन्न हुए और इन्हें श्राप से मुक्त कर दिया।

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