माता पार्वती के क्रोध पर बालक को मिला श्राप, जानिए कैसे हुआ वह श्रापमुक्त

गणेश चौथ गणेश चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन संतान के सुख के लिए व्रत रखा जाता है। यह भगवान श्री गणेश का व्रत होता है और इस दिन पूरा दिन व्रत रखकर चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही तोड़ा जाता है। यही नहीं कई तरह के कष्टों के निवारण के लिए भी कई लोग इस व्रत को करते हैं। जानते हैं गणेश चतुर्थी व्रत के महत्व के बारे में-

बुध ग्रह कमजोर हैं तो शिक्षा और व्यापार पर होगा बुरा असर, जरूर आजमाएं ये उपाय गणेश चतुर्थी व्रत कहां का यह है विशेष महत्व गणेश चतुर्थी के दिन व्रत रखने से जीवन में कई तरह की कठिनाइयों से छुटकारा मिलता है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है कई माताएं अपनी संतान के सुख के लिए यह व्रत रखती है। यह दिन भगवान श्री गणेश को समर्पित होता है। संकष्टी चतुर्थी का अर्थ होता है कठिनाईयों से मुक्ति पाना। इस दिन कई लोग अपने दु:खों से छुटकारा पाने के लिए भी इस व्रत को रखते हैं। कई पौराणिक कथाओं में इस व्रत का उल्लेख मिलता है जिसमें व्यक्ति कई तरह की समस्याओं से मुक्ति पाता है। इस दिन गणेश जी की आराधना की जाती है। रात में चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रमा की पूजा कर व्रत तोड़ा जाता है। इस दिन भगवान गणेश भक्त की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं।


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गणेश चतुर्थी पर ऐसे करें पूजन

गणेश जी की इस दिन आराधना करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। इसके लिए पूजन विधि में कई विशेष बातों का ख्याल रखना चाहिए।

-प्रात: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहने। चाहे तो लाल रंग का वस्त्र पहन सकते हैं पूजन के लिए लाल रंग शुभ होता है।

-इसके बाद गणेश जी पूजन करें। गणेश जी मूर्ति के साथ देवी दुर्गा की प्रतिमा भी रखें। सबसे पहले गणेश जी को शुध्द जल से स्नान कर चंदन, अक्क्षत, फूल, वस्त्र चढ़ाएं साथ ही देवी की प्रतिमा पर भी चंदन, फूल चढ़ाए।

- भगवान गणेश को नैवेद्य में नारियल और गुड़ चढ़ा सकते हैं। भगवान गणेश को मोदक बहुत पसंद होते हैं तो इन्हे मोदक या लड्डू का भोग लगाएं। धूप दीप से इनका पूजन करें।

-गणेश जी के लिए यह मन्त्रोच्चारण करें-

“गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम।

उमासुतं शोक विनाशकारकम, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।”


गणेश चतुर्थी व्रत की कथा

एक बार की बात है माता पार्वती और भगवान शिव एक नदी के पास बैठे हुए थे तभी माता पार्वती ने शिवजी से चौपड़ खेल खेलने की इच्छा जताई लेकिन समस्या यह थी कि वहां उन दोनों के अलावा तीसरा कोई भी नहीं था जो इस खेल में निर्णायक की भूमिका निभाता इस समस्या का हल निकालने के लिए शिव और पार्वती ने मिलकर एक मिट्टी की मूर्ति बनाकर उस में जान डाल दी मिट्टी से बालक बनाकर उसे आदेश देते हुए कहा कि तुम खेल को अच्छी तरह से देखना और यह बताना कि कौन जीता और कौन हारा। जैसे ही खेल शुरू हुआ माता पार्वती भगवान शिव को हराकर विजय होती रही। खेल में एक बार गलती से उस बालक ने माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया। बालक की इस त्रुटि पर माता पार्वती बहुत अधिक क्रोधित हुई जिससे गुस्से में आकर उन्होंने बालक को लंगड़ा होने का श्राप दे दिया। बालक ने अपनी भूल के लिए माता पार्वती से बहुत माफी मांगी। बालक के बार-बार माफी मांगने पर माता पार्वती ने कहा कि श्राप तो वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन एक उपाय करने पर तुम श्रापमुक्त हो सकते हो। माता पार्वती ने उन्हे तरीका बताया कि संकष्टी चतुर्थी वाले दिन इस जगह पर कुछ कन्या पूजन के लिए आती है तुम उनसे व्रत का विधि विधान पूछना और उसी व्रत को सच्चे मन से करना। बालक ने व्रत की विधि को जानकर पूरी श्रद्धा से इस व्रत को किया और उसकी सच्ची आराधना से भगवान श्री गणेश प्रसन्न हुए और उनसे उनकी मनोकामना पूछी। बालक ने माता पार्वती और भगवान शिव के पास जाने की कामना जताई। भगवान गणेश ने उस बालक की कामना को पूरा किया और शिवलोक की ओर भेज दिया लेकिन वह पहुंचा तो वहां केवल श्री भगवान शिव ही थे। दरअसल माता पार्वती भगवान शिव से नाराज होकर कैलाश छोड़ चली गई थी। जब भगवान शिव ने उस बच्चे को पूछा कि तुम यहां क्यों आए हो तो उस बालक ने बताया कि गणेश जी की पूजा से उन्हें यह वरदान प्राप्त हुआ है यह जानने के बाद भगवान शिव ने भी पार्वती को मनाने के लिए उस व्रत को किया जिसके बाद माता पार्वती भगवान शिव से प्रसन्न होकर कैलाश की ओर वापस लौट आई।

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